हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.62.6

मंडल 5 → सूक्त 62 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
अक्र॑विहस्ता सु॒कृते॑ पर॒स्पा यं त्रासा॑थे वरु॒णेळा॑स्व॒न्तः । राजा॑ना क्ष॒त्रमहृ॑णीयमाना स॒हस्र॑स्थूणं बिभृथः स॒ह द्वौ ॥ (६)
हे उदार हाथों वाले एवं यज्ञकर्ता यजमान की पाप से रक्षा करने वाले मित्र व वरुण! तुम यज्ञभूमि में यजमान की रक्षा करते हो. तुम दोनों सुशोभित एवं क्रोधरहित होकर संपत्ति एवं हजार खंभों वाला भवन धारण करते हो. (६)
O friends and Varuna, who are generous-handed and protect the sacrificial host from the sin of the host! You protect the host in the yajnabhoomi. Both of you, beautified and without anger, wear a building with property and a thousand pillars. (6)