ऋग्वेद (मंडल 5)
ऋ॒तेन॑ ऋ॒तमपि॑हितं ध्रु॒वं वां॒ सूर्य॑स्य॒ यत्र॑ विमु॒चन्त्यश्वा॑न् । दश॑ श॒ता स॒ह त॑स्थु॒स्तदेकं॑ दे॒वानां॒ श्रेष्ठं॒ वपु॑षामपश्यम् ॥ (१)
हम सूर्य के उस मंडल को देखते हैं जो सत्यरूप, जल से आच्छादित एवं शाश्वत है. जहां तुम दोनों की स्थिति है, वहां के घोड़ों को स्तोता मुक्त करता है. वहां एक हजार किरणें रहती हैं एवं वही तेजस्वी देवों में एकमात्र उत्तम है. (१)
We see the circle of the sun that is truly covered with water and eternal. Where you both have the position, there is the horses of the stota free. There are a thousand rays living there and he is the only best among the bright gods. (1)
ऋग्वेद (मंडल 5)
तत्सु वां॑ मित्रावरुणा महि॒त्वमी॒र्मा त॒स्थुषी॒रह॑भिर्दुदुह्रे । विश्वाः॑ पिन्वथः॒ स्वस॑रस्य॒ धेना॒ अनु॑ वा॒मेकः॑ प॒विरा व॑वर्त ॥ (२)
हे मित्र एवं वरुण! तुम्हारा महत्त्व इसलिए प्रसिद्ध है कि उसके द्वारा सदा घूमने वाले सूर्य ने वर्षा ऋतु के स्थावर जलों को दुहा था. तुम गतिशील सूर्य की सभी किरणों को चमकीला बनाते हो. तुम्हारा अकेला रथ धीरेधीरे चले. (२)
Oh my friend and Varun! Your importance is famous because the sun, which is always rotating by it, had milked the standing waters of the rainy season. You make all the rays of the moving sun bright. Your lone chariot moves slowly. (2)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अधा॑रयतं पृथि॒वीमु॒त द्यां मित्र॑राजाना वरुणा॒ महो॑भिः । व॒र्धय॑त॒मोष॑धीः॒ पिन्व॑तं॒ गा अव॑ वृ॒ष्टिं सृ॑जतं जीरदानू ॥ (३)
हे स्तोताओं को राजा बनाने वाले मित्र एवं वरुण! तुम अपने तेजों से धरती-आकाश को धारण किए हो. हे शीघ्र दान करने वाले मित्र व वरुण! तुम ओषधियों को विस्तृत करो. गायों की संख्या बढ़ाओ तथा जल बरसाओ. (३)
These are the friends and Varuna who make the Psalms king! You have possessed the earth and the sky with your brightness. O fast-donating friend and Varun! You elaborate the herbs. Increase the number of cows and pour water. (3)
ऋग्वेद (मंडल 5)
आ वा॒मश्वा॑सः सु॒युजो॑ वहन्तु य॒तर॑श्मय॒ उप॑ यन्त्व॒र्वाक् । घृ॒तस्य॑ नि॒र्णिगनु॑ वर्तते वा॒मुप॒ सिन्ध॑वः प्र॒दिवि॑ क्षरन्ति ॥ (४)
हे मित्र एवं वरुण रथ में ठीक तरह से जुड़े हुए तुम्हारे घोड़े तुम दोनों को ढोवें एवं सारथि द्वारा लगाम खींचने पर शीघ्र रुकें. जल स्वयं तुम्हारे पीछे चलता है एवं तुम्हारी कृपा से ही पुरानी नदियां बहती हैं. (४)
O friend and Varuna, your horses properly connected in the chariot, take both of you and stop quickly when the charioteer pulls the reins. The water itself follows you and it is by your grace that the old rivers flow. (4)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अनु॑ श्रु॒ताम॒मतिं॒ वर्ध॑दु॒र्वीं ब॒र्हिरि॑व॒ यजु॑षा॒ रक्ष॑माणा । नम॑स्वन्ता धृतद॒क्षाधि॒ गर्ते॒ मित्रासा॑थे वरु॒णेळा॑स्व॒न्तः ॥ (५)
हे शरीर के प्रसिद्ध तेज को बढ़ाने वाले, अन्न के स्वामी एवं शक्तिशाली मित्र व वरुण! जिस प्रकार मंत्रों से यज्ञ की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार तुम यज्ञ के द्वारा धरती की रक्षा करो. तुम यज्ञशाला में स्थित रथ पर बैठो. (५)
O the famous sharpener of the body, the master of food and the powerful friend and Varuna! Just as yajna is protected by mantras, so do you protect the earth through yajna. You sit on the chariot located in the yajnashala. (5)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अक्र॑विहस्ता सु॒कृते॑ पर॒स्पा यं त्रासा॑थे वरु॒णेळा॑स्व॒न्तः । राजा॑ना क्ष॒त्रमहृ॑णीयमाना स॒हस्र॑स्थूणं बिभृथः स॒ह द्वौ ॥ (६)
हे उदार हाथों वाले एवं यज्ञकर्ता यजमान की पाप से रक्षा करने वाले मित्र व वरुण! तुम यज्ञभूमि में यजमान की रक्षा करते हो. तुम दोनों सुशोभित एवं क्रोधरहित होकर संपत्ति एवं हजार खंभों वाला भवन धारण करते हो. (६)
O friends and Varuna, who are generous-handed and protect the sacrificial host from the sin of the host! You protect the host in the yajnabhoomi. Both of you, beautified and without anger, wear a building with property and a thousand pillars. (6)
ऋग्वेद (मंडल 5)
हिर॑ण्यनिर्णि॒गयो॑ अस्य॒ स्थूणा॒ वि भ्रा॑जते दि॒व्य१॒॑श्वाज॑नीव । भ॒द्रे क्षेत्रे॒ निमि॑ता॒ तिल्वि॑ले वा स॒नेम॒ मध्वो॒ अधि॑गर्त्यस्य ॥ (७)
मित्र एवं वरुण का रथ सोने का बना हुआ है. उसके खंभे भी सोने के हैं. वह आकाश में बिजली के समान चमकता है. हम घृत, सोम आदि से सुशोभित यज्ञभूमि में रथ के ऊपर सोमरस स्थापित करें. (७)
The chariot of friend and Varuna is made of gold. His pillars are also gold. He shines like lightning in the sky. We install somras on top of the chariot in the yajnabhoomi adorned with ghrit, som etc. (7)
ऋग्वेद (मंडल 5)
हिर॑ण्यरूपमु॒षसो॒ व्यु॑ष्टा॒वयः॑स्थूण॒मुदि॑ता॒ सूर्य॑स्य । आ रो॑हथो वरुण मित्र॒ गर्त॒मत॑श्चक्षाथे॒ अदि॑तिं॒ दितिं॑ च ॥ (८)
हे मित्र एवं वरुण! तुम उषाकाल होने एवं सूर्योदय के पश्चात् अपने लोहे की कीलों वाले स्वर्ण निर्मित रथ में बैठकर चलो. तुम दिति और अदिति दोनों को देखो. (८)
O friend and Varun! You should sit in a golden chariot with your iron nails after dawn and sunrise. You look at both Diti and Aditi. (8)