ऋग्वेद (मंडल 5)
आ नो॑ गन्तं रिशादसा॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ ब॒र्हणा॑ । उपे॒मं चारु॑मध्व॒रम् ॥ (१)
हे शत्रुनाशक एवं शन्रुप्रेरक मित्र व वरुण! तुम हमारे इस अहिंसक यज्ञ में आओ. (१)
O enemies and enemies, inspiring friends and Varuna! You come to this non-violent yagna of ours. (1)
ऋग्वेद (मंडल 5)
विश्व॑स्य॒ हि प्र॑चेतसा॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ राज॑थः । ई॒शा॒ना पि॑प्यतं॒ धियः॑ ॥ (२)
हे उत्तम ज्ञान संपन्न मित्र व वरुण! तुम सारे जगत् के अधिकारी हो. हे स्वामियो! तुम अपनी कृपा द्वारा हमारे कर्म सफल बनाओ. (२)
O great friend of knowledge and Varuna! You are the possessor of all the world. Oh, lord! You make our deeds successful by your grace. (2)
ऋग्वेद (मंडल 5)
उप॑ नः सु॒तमा ग॑तं॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ दा॒शुषः॑ । अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥ (३)
हे मित्र व वरुण! हम हव्यदाताओं द्वारा निचोड़े गए सोम को पीने के लिए आओ. (३)
Oh my friend and Varun! We come to drink the mon squeezed by the havyadatas. (3)