ऋग्वेद (मंडल 5)
वि जि॑हीष्व वनस्पते॒ योनिः॒ सूष्य॑न्त्या इव । श्रु॒तं मे॑ अश्विना॒ हवं॑ स॒प्तव॑ध्रिं च मुञ्चतम् ॥ (५)
हे लकड़ी के बने संदूक! तुम बच्चा जन्मती नारी की योनि के समान खुल जाओ. हे अश्वरिनीकुमारो! तुम मुझ सप्तवध्रि ऋषि की पुकार सुनकर इस संदूक से मुझे छुड़ाओ. (५)
O wooden ark! You open up like the vagina of the baby-born woman. O Ashvrinikumaro! You hear the call of my sage Saptavadri and rescue me from this ark. (5)