ऋग्वेद (मंडल 5)
अश्वि॑ना॒वेह ग॑च्छतं॒ नास॑त्या॒ मा वि वे॑नतम् । हं॒सावि॑व पतत॒मा सु॒ताँ उप॑ ॥ (१)
हे अश्विनीकुमारो! इस यज्ञ में आओ. हे नासत्यो! तुम हमारे प्रति उदासीन मत बनो. हंस जिस प्रकार निर्मल पानी के पास आता है, उसी प्रकार तुम हमारे सोमरस के पास आओ. (१)
O Ashwinikumaro! Come to this yajna. O nastyo! Don't be indifferent to us. Just as the swan comes near the pure water, so you come to our somras. (1)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अश्वि॑ना हरि॒णावि॑व गौ॒रावि॒वानु॒ यव॑सम् । हं॒सावि॑व पतत॒मा सु॒ताँ उप॑ ॥ (२)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार हिरण एवं गौरमृग घास तथा हंस साफ पानी के पास आते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे सोमरस के पास आओ. (२)
O Ashwinikumaro! Just as deer and gourd grass and swan come near clean water, so come to our somras. (2)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अश्वि॑ना वाजिनीवसू जु॒षेथां॑ य॒ज्ञमि॒ष्टये॑ । हं॒सावि॑व पतत॒मा सु॒ताँ उप॑ ॥ (३)
हे अन्नप्राप्ति के लिए घर देने वाले अश्चिनीकुमारो! हमारी इच्छा पूरी करने के लिए इस यज्ञ में आओ. हंस जैसे साफ पानी के पास जाते हैं, वैसे ही तुम हमारे सोमरस के पास आओ. (३)
O Ashchinikumaro who gives houses for the sake of food! Come to this yagna to fulfill our wish. Go to clean water like gooses, so you come to our somras. (3)
ऋग्वेद (मंडल 5)
अत्रि॒र्यद्वा॑मव॒रोह॑न्नृ॒बीस॒मजो॑हवी॒न्नाध॑मानेव॒ योषा॑ । श्ये॒नस्य॑ चि॒ज्जव॑सा॒ नूत॑ने॒नाग॑च्छतमश्विना॒ शंत॑मेन ॥ (४)
हे अश्विनीकुमारो! हमारे पिता अत्रि ने तुम्हारी स्तुति की. यदि स्त्री की मनुहार की जाए तो वह पति की इच्छा पूर्ण करती है, उसी प्रकार अत्रि ऋषि ने अग्निदाह से छुटकारा पाया. हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने सुखदायक रथ द्वारा बाज पक्षी की अद्वितीय चाल द्वारा हमारी रक्षा करने आओ. (४)
O Ashwinikumaro! Our father Atri praised you. If the woman is blessed, she fulfills the desire of the husband, in the same way sage Atri got rid of the agni. O Ashwinikumaro! You come to protect us by the unique moves of the hawk bird by your soothing chariot. (4)
ऋग्वेद (मंडल 5)
वि जि॑हीष्व वनस्पते॒ योनिः॒ सूष्य॑न्त्या इव । श्रु॒तं मे॑ अश्विना॒ हवं॑ स॒प्तव॑ध्रिं च मुञ्चतम् ॥ (५)
हे लकड़ी के बने संदूक! तुम बच्चा जन्मती नारी की योनि के समान खुल जाओ. हे अश्वरिनीकुमारो! तुम मुझ सप्तवध्रि ऋषि की पुकार सुनकर इस संदूक से मुझे छुड़ाओ. (५)
O wooden ark! You open up like the vagina of the baby-born woman. O Ashvrinikumaro! You hear the call of my sage Saptavadri and rescue me from this ark. (5)
ऋग्वेद (मंडल 5)
भी॒ताय॒ नाध॑मानाय॒ ऋष॑ये स॒प्तव॑ध्रये । मा॒याभि॑रश्विना यु॒वं वृ॒क्षं सं च॒ वि चा॑चथः ॥ (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम भयभीत एवं प्रार्थना करते हुए सप्तवध्रि ऋषि के छुटकारे के लिए बंद संदूक को खोलो. (६)
O Ashwinikumaro! You open the closed ark for the redemption of sage Saptavadri while you are afraid and praying. (6)
ऋग्वेद (मंडल 5)
यथा॒ वातः॑ पुष्क॒रिणीं॑ समि॒ङ्गय॑ति स॒र्वतः॑ । ए॒वा ते॒ गर्भ॑ एजतु नि॒रैतु॒ दश॑मास्यः ॥ (७)
सप्तवध्रि ऋषि अपनी पत्नी से कहते हैं-”हवा जिस प्रकार सरोवर के जल को सब ओर से कंपित करती है, उसी प्रकार तुम्हारा दस महीने का गर्भ गतिशील हो.” (७)
The sage Saptavadri says to his wife, "Just as the wind vibrates the water of the lake from all sides, so may your ten-month-old womb be in motion." (7)
ऋग्वेद (मंडल 5)
यथा॒ वातो॒ यथा॒ वनं॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति । ए॒वा त्वं द॑शमास्य स॒हावे॑हि ज॒रायु॑णा ॥ (८)
“वायु, वन एवं समुद्र जिस प्रकार कांपते हैं, उसी प्रकार तुम्हारा दस मास का गर्भ जरायु के साथ बाहर आवे.” (८)
"Just as the air, the forest, and the sea tremble, so may your ten-month-old womb come out with Zarayu." (8)