हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
श्नथ॑द्वृ॒त्रमु॒त स॑नोति॒ वाज॒मिन्द्रा॒ यो अ॒ग्नी सहु॑री सप॒र्यात् । इ॒र॒ज्यन्ता॑ वस॒व्य॑स्य॒ भूरेः॒ सह॑स्तमा॒ सह॑सा वाज॒यन्ता॑ ॥ (१)
वे लोग शत्रु को मारते हैं एवं अन्न प्राप्त करते हैं जो लोग शत्रुपराभवकर्ता इंद्र एवं अग्नि की सेवा करते हैं, वे विशाल धन के स्वामी एवं बल से शत्रुओं को बुरी तरह हराने वाले हैं. (१)
Those who kill the enemy and get food, those who serve the enemy, the defeators Indra and Agni, are the masters of huge wealth and those who defeat the enemies badly with force. (1)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
ता यो॑धिष्टम॒भि गा इ॑न्द्र नू॒नम॒पः स्व॑रु॒षसो॑ अग्न ऊ॒ळ्हाः । दिशः॒ स्व॑रु॒षस॑ इन्द्र चि॒त्रा अ॒पो गा अ॑ग्ने युवसे नि॒युत्वा॑न् ॥ (२)
हे इंद्र एवं अग्नि! यह बात सत्य है कि तुमने खोई हुई गायों, जलों, सूर्य एवं उषा के निमित्त युद्ध किया था. हे इंद्र एवं अश्वस्वामी अग्नि! तुम दोनों ने संसार को दिशाओं, सूर्य, उषाओं, विचित्र जलों एवं गायों से युक्त किया था. (२)
O Indra and Agni! It is true that you fought for lost cows, waters, sun and usha. O Indra and Ashwaswamy Agni! You both made the world full of directions, the sun, the ushas, the strange waters and the cows. (2)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
आ वृ॑त्रहणा वृत्र॒हभिः॒ शुष्मै॒रिन्द्र॑ या॒तं नमो॑भिरग्ने अ॒र्वाक् । यु॒वं राधो॑भि॒रक॑वेभिरि॒न्द्राग्ने॑ अ॒स्मे भ॑वतमुत्त॒मेभिः॑ ॥ (३)
हे वृत्रहंता इंद्र एवं अग्नि! तुम शत्रुओं को नष्ट करने वाली शक्तियों एवं हमारे दिव्य हव्यान्नों के साथ हमारे सामने आओ. हे इंद्र एवं अग्नि! तुम दोषरहित एवं उत्तम धन लेकर हमारे सामने आओ. (३)
O Vrithrahanta Indra and Agni! You come before us with the forces that destroy the enemies and our divine desires. O Indra and Agni! You come before us with flawless and good money. (3)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
ता हु॑वे॒ ययो॑रि॒दं प॒प्ने विश्वं॑ पु॒रा कृ॒तम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी न म॑र्धतः ॥ (४)
मैं उन्हीं इंद्र एवं अग्नि को बुलाता हूं, जिनके वीरतापूर्ण कर्मो का ऋषियों ने वर्णन किया है, एवं जो अपने स्तोताओं की हिंसा नहीं करते. (४)
I call upon the same Indra and Agni, whose heroic deeds have been described by the sages, and who do not do violence to their stoes. (4)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
उ॒ग्रा वि॑घ॒निना॒ मृध॑ इन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे । ता नो॑ मृळात ई॒दृशे॑ ॥ (५)
हम उग्र एवं विशेषरूप से शत्रुहंता इंद्र एवं अग्नि को बुलाते हैं. वे इस संग्राम में हमें सुखी बनावें. (५)
We call the fierce and especially the enemy Indra and agni. May they make us happy in this struggle. (5)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
ह॒तो वृ॒त्राण्यार्या॑ ह॒तो दासा॑नि॒ सत्प॑ती । ह॒तो विश्वा॒ अप॒ द्विषः॑ ॥ (६)
सज्जनों का पालन करने वाले इंद्र एवं अग्नि यज्ञकर्तताओं एवं यज्ञकर्महीन लोगों द्वारा किए हुए उपद्रव शांत करते हैं एवं सारे शत्रुओं को मारते हैं. (६)
Indra and Agni, who follow the gentlemen, calm down the disturbances committed by the yajnakartas and the sacrificial people and kill all the enemies. (6)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
इन्द्रा॑ग्नी यु॒वामि॒मे॒३॒॑ऽभि स्तोमा॑ अनूषत । पिब॑तं शम्भुवा सु॒तम् ॥ (७)
हे इंद्र एवं अग्नि! ये स्तोता तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. हे सुख देने वाले इंद्र एवं अग्नि! इस सोमरस को पिओ. (७)
O Indra and Agni! These hymns praise you. O Indra and Agni, who give happiness! Drink this somras. (7)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 60
या वां॒ सन्ति॑ पुरु॒स्पृहो॑ नि॒युतो॑ दा॒शुषे॑ नरा । इन्द्रा॑ग्नी॒ ताभि॒रा ग॑तम् ॥ (८)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम अपने उन घोड़ों पर सवार होकर आओ, जो बहुत लोगों द्वारा अभिलषित हैं एवं हव्य देने वाले यजमानों के लिए जन्मे हैं. (८)
O Indra and Agni! Come on your horses, which are expressed by many and are born to the hosts who give greetings. (8)
Page 1 of 2Next →