ऋग्वेद (मंडल 6)
र॒थ॒वाह॑नं ह॒विर॑स्य॒ नाम॒ यत्रायु॑धं॒ निहि॑तमस्य॒ वर्म॑ । तत्रा॒ रथ॒मुप॑ श॒ग्मं स॑देम वि॒श्वाहा॑ व॒यं सु॑मन॒स्यमा॑नाः ॥ (८)
हवि जिस प्रकार अग्नि को बढ़ाता है, उसी प्रकार रथ द्वारा ढोया गया शत्रुओं का धन इस राजा को बढ़ाता है. रथ पर राजा के आयुध और कवच रखे रहते हैं. प्रसन्नचित्त हम भरद्वाजवंशी सदा उस रथ के पास जावें. (८)
Just as Havi increases the agni, so the wealth of the enemies carried by the chariot increases this king. The king's arms and armor remain on the chariot. Happy, let us go to that chariot always. (8)