हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
जी॒मूत॑स्येव भवति॒ प्रती॑कं॒ यद्व॒र्मी याति॑ स॒मदा॑मु॒पस्थे॑ । अना॑विद्धया त॒न्वा॑ जय॒ त्वं स त्वा॒ वर्म॑णो महि॒मा पि॑पर्तु ॥ (१)
युद्धों के आरंभ होने पर यह राजा जब कवच पहन कर जाता है, तब इसका रूप बादल के समान जान पड़ता है. हे राजा! तुम शत्रुओं द्वारा बिना बिंधे शरीर से जय प्राप्त करो. कवच की यह महिमा तुम्हारी रक्षा करे. (१)
When the wars begin, when this king wears armor, its appearance looks like a cloud. O King! You get victory from the body without being pierced by enemies. May this glory of armor protect you. (1)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
धन्व॑ना॒ गा धन्व॑ना॒जिं ज॑येम॒ धन्व॑ना ती॒व्राः स॒मदो॑ जयेम । धनुः॒ शत्रो॑रपका॒मं कृ॑णोति॒ धन्व॑ना॒ सर्वाः॑ प्र॒दिशो॑ जयेम ॥ (२)
हम धनुष के द्वारा गायों एवं युद्ध को जीतेंगे. हम धनुष की सहायता से शत्रुओं की उद्धत एवं मदवाली सेनाओं को जीतेंगे. हमारा धनुष शत्रुओं की अभिलाषाएं नष्ट करे. हम धनुष द्वारा सब दिशाओं को जीतें. (२)
We will win the cows and war with the bow (and arrow). With the help of the bow, we will conquer the armies of the enemies. May our bow destroy the intent of the enemies. We win in all directions by bow. (2)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
व॒क्ष्यन्ती॒वेदा ग॑नीगन्ति॒ कर्णं॑ प्रि॒यं सखा॑यं परिषस्वजा॒ना । योषे॑व शिङ्क्ते॒ वित॒ताधि॒ धन्व॒ञ्ज्या इ॒यं सम॑ने पा॒रय॑न्ती ॥ (३)
युद्धभूमि में पार लगाने वाली यह धनुष की डोरी धनुष पर विस्तृत होकर प्रिय वचन बोलने की अभिलाषा सी करती हुई प्यारी बातें कहने के लिए धनुर्धारी के कान के समीप आती है. पति का आलिंगन करके बात करने वाली नारी के समान यह डोरी बाण को छूकर शब्द करती है. (३)
This bow string, which crosses the battlefield, expands on the bow and comes close to the archer's ear to say sweet things, wishing to speak dear words. Like a woman who hugs her husband and talks, this string touches the arrow and makes the words. (3)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
ते आ॒चर॑न्ती॒ सम॑नेव॒ योषा॑ मा॒तेव॑ पु॒त्रं बि॑भृतामु॒पस्थे॑ । अप॒ शत्रू॑न्विध्यतां संविदा॒ने आर्त्नी॑ इ॒मे वि॑ष्फु॒रन्ती॑ अ॒मित्रा॑न् ॥ (४)
धनुष की दोनों कोटियां परस्पर प्रिय आचरण करने वाली नारियों के समान कार्य करती हुई युद्ध में राजा की इस प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार माता पुत्र की रक्षा करती है. ये परस्पर विरोध छोड़कर जाती हुई इस राजा के अमित्रों को मारकर शत्रुओं को बेध दें. (४)
Both the bows acting like mutually beloved women, protect the king in battle in such a way that the mother protects the son. They leave the conflict and kill the enemies of this king's enemies. (4)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
ब॒ह्वी॒नां पि॒ता ब॒हुर॑स्य पु॒त्रश्चि॒श्चा कृ॑णोति॒ सम॑नाव॒गत्य॑ । इ॒षु॒धिः सङ्काः॒ पृत॑नाश्च॒ सर्वाः॑ पृ॒ष्ठे निन॑द्धो जयति॒ प्रसू॑तः ॥ (५)
यह तरकस बहुत से बाणों का पिता है. बहुत से बाण इसके पुत्र हैं. बाण निकालने पर इससे त्रिश्चा शब्द होता है. तरकस योद्धा की पीठ पर बंधा हुआ है, युद्धों को जानकर बाणों को जन्म देता है एवं सब सेनाओं को जीतता है. (५)
This trick is the father of many arrows. Many arrows are its sons. When an arrow is removed, it contains the word trischa. The tarkas is tied on the warrior's back, knowing wars gives rise to arrows and conquers all armies. (5)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
रथे॒ तिष्ठ॑न्नयति वा॒जिनः॑ पु॒रो यत्र॑यत्र का॒मय॑ते सुषार॒थिः । अ॒भीशू॑नां महि॒मानं॑ पनायत॒ मनः॑ प॒श्चादनु॑ यच्छन्ति र॒श्मयः॑ ॥ (६)
उत्तम सारथि रथ पर बैठकर अपने सामने वाले घोड़ों को जहां चाहता है, वहां ले जाता है. हे मनुष्यो! उन लगामों की महिमा बखानो. घोड़े के मुंह से पीछे की ओर जाती हुई लगामें सारथि के मन के अनुसार घोड़ों को वश में करती हैं. (६)
Uttam Sarathi sits on the chariot and takes the horses in front of him wherever he wants. O men! Tell the glory of those reins. Going backwards from the horse's mouth, they subdue the horses according to Sarathi's mind. (6)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
ती॒व्रान्घोषा॑न्कृण्वते॒ वृष॑पाण॒योऽश्वा॒ रथे॑भिः स॒ह वा॒जय॑न्तः । अ॒व॒क्राम॑न्तः॒ प्रप॑दैर॒मित्रा॑न्क्षि॒णन्ति॒ शत्रू॒ँरन॑पव्ययन्तः ॥ (७)
धूल उड़ाते हुए एवं रथों के साथ तेज दौड़ते हुए घोड़े जोर से हिनहिनाते हैं. वे युद्ध से न भागते हुए हिंसक शत्रुओं को अपनी टापों से कुचलते हैं. (७)
The horses, blowing dust and running briskly with chariots, wiggle loudly. They crush violent enemies with their toes without running away from war. (7)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 75
र॒थ॒वाह॑नं ह॒विर॑स्य॒ नाम॒ यत्रायु॑धं॒ निहि॑तमस्य॒ वर्म॑ । तत्रा॒ रथ॒मुप॑ श॒ग्मं स॑देम वि॒श्वाहा॑ व॒यं सु॑मन॒स्यमा॑नाः ॥ (८)
हवि जिस प्रकार अग्नि को बढ़ाता है, उसी प्रकार रथ द्वारा ढोया गया शत्रुओं का धन इस राजा को बढ़ाता है. रथ पर राजा के आयुध और कवच रखे रहते हैं. प्रसन्नचित्त हम भरद्वाजवंशी सदा उस रथ के पास जावें. (८)
Just as Havi increases the agni, so the wealth of the enemies carried by the chariot increases this king. The king's arms and armor remain on the chariot. Happy, let us go to that chariot always. (8)
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