हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 7.104.18

मंडल 7 → सूक्त 104 → श्लोक 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 7)

ऋग्वेद: | सूक्त: 104
वि ति॑ष्ठध्वं मरुतो वि॒क्ष्वि१॒॑च्छत॑ गृभा॒यत॑ र॒क्षसः॒ सं पि॑नष्टन । वयो॒ ये भू॒त्वी प॒तय॑न्ति न॒क्तभि॒र्ये वा॒ रिपो॑ दधि॒रे दे॒वे अ॑ध्व॒रे ॥ (१८)
हे मरुतो! तुम प्रजाओं में अनेक प्रकार से स्थित बनो. जो राक्षस रात में पक्षी बनकर नीचे उतरते हैं अथवा जो प्रज्वलित यज्ञ में बाधा डालते हैं, उन्हें अपनी इच्छानुसार पकड़ो एवं पीस डालो. (१८)
O Maruto! You become located in many ways among the people. The demons who come down as birds at night or who obstruct the ignited yagna, hold them as per your wish and grind them. (18)