ऋग्वेद (मंडल 7)
शुची॑ वो ह॒व्या म॑रुतः॒ शुची॑नां॒ शुचिं॑ हिनोम्यध्व॒रं शुचि॑भ्यः । ऋ॒तेन॑ स॒त्यमृ॑त॒साप॑ आय॒ञ्छुचि॑जन्मानः॒ शुच॑यः पाव॒काः ॥ (१२)
हे मरुतो! तुम शुद्धों के लिए शुद्ध हव्य हो. तुम शुद्धों के लिए मैं शुद्ध यज्ञ करता हूं. जल को छूने वाले मरुत् सत्य को प्राप्त करते हैं. शुद्ध जल वाले एवं शुद्ध मरुद्गण दूसरों को भी शुद्ध करते हैं. (१२)
O Maruto! You are pure for the pure. I perform pure yajna for you pure. Those who touch the water attain the truth. Pure water and pure deserts purify others as well. (12)