ऋग्वेद (मंडल 7)
क ईं॒ व्य॑क्ता॒ नरः॒ सनी॑ळा रु॒द्रस्य॒ मर्या॒ अध॒ स्वश्वाः॑ ॥ (१)
ये कांतियुक्त नेता, एक घर में रहने वाले, महादेव के पुत्र, मानवहितकारी एवं शोभन अश्वो वाले मरुद्गण कौन हैं. (१)
Who are these kantiyukta leaders, living in a house, sons of Mahadeva, the marudgans of man-hit and shobhan ashwas? (1)
ऋग्वेद (मंडल 7)
नकि॒र्ह्ये॑षां ज॒नूंषि॒ वेद॒ ते अ॒ङ्ग वि॑द्रे मि॒थो ज॒नित्र॑म् ॥ (२)
इनके जन्मों को कोई नहीं जानता, अपने जन्म की बात वे मरुत् ही आपस में जानते हैं. (२)
No one knows their births, they know their births among themselves. (2)
ऋग्वेद (मंडल 7)
अ॒भि स्व॒पूभि॑र्मि॒थो व॑पन्त॒ वात॑स्वनसः श्ये॒ना अ॑स्पृध्रन् ॥ (३)
मरुत् अपने संचरणों के द्वारा आपस में मिलते हैं. ये हवा के समान तेज उड़ने वाले बाजों के समान आपस में स्पर्धा करते हैं. (३)
The deserts meet through their transmissions. They compete among themselves like hawks flying as fast as the wind. (3)
ऋग्वेद (मंडल 7)
ए॒तानि॒ धीरो॑ नि॒ण्या चि॑केत॒ पृश्नि॒र्यदूधो॑ म॒ही ज॒भार॑ ॥ (४)
धीर व्यक्ति इन सर्वांगश्वेत मरुतों को जानते हैं. पृश्नि ने इन्हें अंतरिक्ष में धारण किया था. (४)
Patient people know these omnipotent maruts. The earth held them in space. (4)
ऋग्वेद (मंडल 7)
सा विट् सु॒वीरा॑ म॒रुद्भि॑रस्तु स॒नात्सह॑न्ती॒ पुष्य॑न्ती नृ॒म्णम् ॥ (५)
वह प्रजा मरुतों के कारण चिरकाल से शत्रुओं को हराती हुई धन को पुष्ट करने वाली एवं शोभनपुत्रों वाली हो. (५)
She is the one who has been a protector of wealth and adornment of wealth, defeating the enemies for eternity because of the people maruts. (5)
ऋग्वेद (मंडल 7)
यामं॒ येष्ठाः॑ शु॒भा शोभि॑ष्ठाः श्रि॒या सम्मि॑श्ला॒ ओजो॑भिरु॒ग्राः ॥ (६)
मरुत् जाने योग्य स्थानों को सबसे अधिक जाते हैं, अलंकारों से बहुत अधिक सुशोभित हैं, शोभायुक्त एवं ओजों से उग्र हैं. (६)
Most of the places that are deserted, are adorned with ornaments, adorned with ornaments, adorned with ornaments and fierce with oozes. (6)
ऋग्वेद (मंडल 7)
उ॒ग्रं व॒ ओजः॑ स्थि॒रा शवां॒स्यधा॑ म॒रुद्भि॑र्ग॒णस्तुवि॑ष्मान् ॥ (७)
हे मरुतो! तुम्हारा तेज उग्र और बल स्थित हो. तुम बुद्धि वाले बनो. (७)
O Maruto! Yours are sharply furious and force-located. You become wise. (7)
ऋग्वेद (मंडल 7)
शु॒भ्रो वः॒ शुष्मः॒ क्रुध्मी॒ मनां॑सि॒ धुनि॒र्मुनि॑रिव॒ शर्ध॑स्य धृ॒ष्णोः ॥ (८)
हे मरुतो! तुम्हारा बल सब ओर शोभा वाला एवं तुम्हारे मन क्रोधपूर्ण हैं. शत्रु पराभवकारी एवं शक्तिशाली मरुद्गण का वेग स्तोता के समान अनेक प्रकार का शब्द करता है. (८)
O Maruto! Your strength is adorned everywhere and your mind is angry. The velocity of enemy defeators and powerful deserts makes many kinds of words similar to that of stota. (8)