ऋग्वेद (मंडल 7)
ए॒ष स्य मि॑त्रावरुणा नृ॒चक्षा॑ उ॒भे उदे॑ति॒ सूर्यो॑ अ॒भि ज्मन् । विश्व॑स्य स्था॒तुर्जग॑तश्च गो॒पा ऋ॒जु मर्ते॑षु वृजि॒ना च॒ पश्य॑न् ॥ (२)
हे मित्र व वरुण! ये ही मानवों के देखने वाले सूर्य द्यावा-पृथिवी की ओर उदित होते हैं. सूर्य सब स्थावर एवं गतिशील प्राणियों के पालनकर्ता हैं तथा मानवों में पाप और पुण्य देखते हैं. (२)
Oh my friend and Varun! These are the ones that rise towards the sun diva-earth that humans see. The Sun is the sustainer of all real and moving beings and sees sin and virtue in human beings. (2)