ऋग्वेद (मंडल 7)
प्र मि॒त्रयो॒र्वरु॑णयोः॒ स्तोमो॑ न एतु शू॒ष्यः॑ । नम॑स्वान्तुविजा॒तयोः॑ ॥ (१)
बार-बार प्रादुर्भूत होने वाले मित्र एवं वरुण का सुखदाता तथा अन्नयुक्त स्तोत्र उनके समीप जावे. (१)
Go to him a happy and grained hymn of a friend and Varuna who is repeatedly born. (1)