हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.18.16

मंडल 8 → सूक्त 18 → श्लोक 16 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 18
आ शर्म॒ पर्व॑ताना॒मोतापां वृ॑णीमहे । द्यावा॑क्षामा॒रे अ॒स्मद्रप॑स्कृतम् ॥ (१६)
हम अभिमुख होकर पर्वतसंबंधी एवं जलसंबंधी सुखों का वरण करते हैं. द्यावा-पृथिवी पाप को हमसे दूर ले जावें. (१६)
We turn to the side and choose mountain-related and water-related pleasures. Let the earthly sin be taken away from us. (16)