ऋग्वेद (मंडल 8)
न त्वा॑ रासीया॒भिश॑स्तये वसो॒ न पा॑प॒त्वाय॑ सन्त्य । न मे॑ स्तो॒ताम॑ती॒वा न दुर्हि॑तः॒ स्याद॑ग्ने॒ न पा॒पया॑ ॥ (२६)
हे वासदाता अग्नि! मैं मिथ्या अपवाद के लिए तुम पर आक्रोश नहीं करूंगा और न पाप के लिए तुम्हारा अपमान करूंगा. मेरा स्तोता भी ऐसा नहीं करेगा. बुद्धिहीन शत्रु बनकर मुझे बाधा न पहुंचावें. (२६)
O godly agni! I will not outrage you for the false exception nor will I insult you for sin. My stota won't do that either. Don't interrupt me by being a mindless enemy. (26)