ऋग्वेद (मंडल 8)
पि॒तुर्न पु॒त्रः सुभृ॑तो दुरो॒ण आ दे॒वाँ ए॑तु॒ प्र णो॑ ह॒विः ॥ (२७)
भली प्रकार भरणकर्ता अग्नि हमारे यज्ञगृह में हमारा हवि देवों को इस प्रकार पहुंचावें जिस प्रकार पुत्र पिता की सेवा करता है. (२७)
May the well-to-do agni deliver our happiness to the gods in our sacrificial house in such a way that the Son serves the Father. (27)