हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
अग्न॒ आ या॑ह्य॒ग्निभि॒र्होता॑रं त्वा वृणीमहे । आ त्वाम॑नक्तु॒ प्रय॑ता ह॒विष्म॑ती॒ यजि॑ष्ठं ब॒र्हिरा॒सदे॑ ॥ (१)
हे अग्नि! तुम यज्ञ के योग्य अन्य अग्नियों के साथ आओ. हम होता के रूप में तुम्हारा वरण करते हैं. अध्वर्युजनों द्वारा हाथों में उठाया गया एवं घृतपूर्ण खुच तुम्हें कुशों पर सब ओर बैठावे. (१)
O agni! You come with other agnis worthy of yajna. We choose you as we would. May the cowards, raised in their hands and disgusted, make you sit all over the kushas. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
अच्छा॒ हि त्वा॑ सहसः सूनो अङ्गिरः॒ स्रुच॒श्चर॑न्त्यध्व॒रे । ऊ॒र्जो नपा॑तं घृ॒तके॑शमीमहे॒ऽग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम् ॥ (२)
हे बल के पुत्र एवं अंगिरागोत्रीय अग्नि! यज्ञ में तुम्हें प्राप्त करने के लिए खुच चलते हैं. हम पालनकर्ता, प्रदीप्त ज्वाला वाले एवं प्राचीन अग्नि की यज्ञ में स्तुति करते हैं. (२)
O son of force and agni! Let's go to get you in the yajna. We praise the sustainer, the illuminated flame and the ancient agni in the yagna. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
अग्ने॑ क॒विर्वे॒धा अ॑सि॒ होता॑ पावक॒ यक्ष्यः॑ । म॒न्द्रो यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्यो॒ विप्रे॑भिः शुक्र॒ मन्म॑भिः ॥ (३)
हे अग्नि! तुम मेधावी, कर्मफलों का निर्माण करने वाले, पवित्रकर्तता, देवों को बुलाने वाले एवं यज्ञ के योग्य हो. हे दीप्त अग्नि! तुम प्रसन्न करने योग्य, अतिशय यज्ञपात्र एवं यज्ञों में मेधावी ऋत्विजों द्वारा मननीय स्तोत्रों द्वारा स्तुति करने योग्य हो. (३)
O agni! You are meritorious, the creator of the fruits of karma, the purity, the caller of the gods and the worthy of yajna. O bright agni! You are worthy of pleasing, very important yagyapatra and praiseworthy of the meritorious ritvijas in the yajnas through the considered stotras. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
अद्रो॑घ॒मा व॑होश॒तो य॑विष्ठ्य दे॒वाँ अ॑जस्र वी॒तये॑ । अ॒भि प्रयां॑सि॒ सुधि॒ता व॑सो गहि॒ मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः ॥ (४)
हे अतिशय युवा एवं नित्य अग्नि! मुझ द्रोहशून्य यजमान की अभिलाषा करने वाले देवों को हव्यभक्षण के लिए लाओ. हे निवासस्थान देने वाले अग्नि! सुनिहित अन्नों को लेकर आओ एवं स्तुतियों द्वारा स्थापित होकर प्रसन्न बनो. (४)
O very young and eternal agni! Bring the gods who desire me to be the disobedient host for lust. O agni that gives you the place of residence! Bring the well-nourished grains and be happy to be established by praises. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
त्वमित्स॒प्रथा॑ अ॒स्यग्ने॑ त्रातरृ॒तस्क॒विः । त्वां विप्रा॑सः समिधान दीदिव॒ आ वि॑वासन्ति वे॒धसः॑ ॥ (५)
हे अग्नि! तुम रक्षक, सच्चे, अधिक बुद्धिमान्‌ एवं सभी प्रकार विशाल हो. हे भली प्रकार दीप्त अग्नि! मेधावी स्तोता तुम्हारी सेवा करते हैं. (५)
O agni! You are protector, truer, more intelligent and vast in all respects. O beautiful agni! Meritorious hymns serve you. (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
शोचा॑ शोचिष्ठ दीदि॒हि वि॒शे मयो॒ रास्व॑ स्तो॒त्रे म॒हाँ अ॑सि । दे॒वानां॒ शर्म॒न्मम॑ सन्तु सू॒रयः॑ शत्रू॒षाहः॑ स्व॒ग्नयः॑ ॥ (६)
हे अतिशय पवित्र अग्नि! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं हमें दीप्त बनाओ तथा प्रजा और स्तोता को सुख दो. तुम महान्‌ हो. मेरे स्तोता देवों द्वारा दिया हुआ सुख प्राप्त करें एवं शोभन अग्नि वाले बनें. (६)
O very holy agni! You yourself become deep and make us deep and give happiness to the people and the psalms. You are great. Get the happiness given by my stota devas and become shobhan agni wale. (6)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
यथा॑ चिद्वृ॒द्धम॑त॒समग्ने॑ सं॒जूर्व॑सि॒ क्षमि॑ । ए॒वा द॑ह मित्रमहो॒ यो अ॑स्म॒ध्रुग्दु॒र्मन्मा॒ कश्च॒ वेन॑ति ॥ (७)
हे मित्रों के पूजक अग्नि! तुम धरती पर जिस प्रकार सूखे काठ को जलाते हो, उसी प्रकार जो हमारा द्रोही है एवं जो हमारे प्रति दुष्ट बुद्धि रखता है, उसे जलाओ. (७)
O worshiper of friends, agni! Just as you burn dry wood on the earth, burn him who is our enemy and who has evil intelligence towards us. (7)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 49
मा नो॒ मर्ता॑य रि॒पवे॑ रक्ष॒स्विने॒ माघशं॑साय रीरधः । अस्रे॑धद्भिस्त॒रणि॑भिर्यविष्ठ्य शि॒वेभिः॑ पाहि पा॒युभिः॑ ॥ (८)
हे अतिशय युवा अग्नि! हमें शक्तिशाली शत्रु मानव एवं अनिष्ट चाहने वाले के वश में मत करना. तुम हिंसारहित, तारने वाले एवं सुखकर पालनोपायों द्वारा हमारी रक्षा करो. (८)
O very young agni! Do not subdue us by powerful enemies human beings and evil seekers. Protect us through violence-free, tearful and happy cradles. (8)
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