ऋग्वेद (मंडल 8)
तत्सु नो॒ विश्वे॑ अ॒र्य आ सदा॑ गृणन्ति का॒रवः॑ । म॒रुतः॒ सोम॑पीतये ॥ (३)
इधर-उधर जाने वाले हमारे सब स्तोता सोमरस पीने के लिए सदा मरुतों की स्तुति करते हैं. (३)
All our stotas who go around always praise the maruts for drinking somras. (3)