हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
अ॒स्मा उ॒षास॒ आति॑रन्त॒ याम॒मिन्द्रा॑य॒ नक्त॒मूर्म्याः॑ सु॒वाचः॑ । अ॒स्मा आपो॑ मा॒तरः॑ स॒प्त त॑स्थु॒र्नृभ्य॒स्तरा॑य॒ सिन्ध॑वः सुपा॒राः ॥ (१)
इंद्र से डरी हुई उषाएं अपनी गति बढ़ाती रहती हैं. इंद्र के कारण ही सब रात्रियां निशांत में शोभनवाक्यों वाली बनती हैं. इंद्र के कारण ही सात नदियां मानव हितकारिणी एवं सरलता से पार होने योग्य रहती हैं. (१)
Usha, who is afraid of Indra, keeps increasing their speed. It is because of Indra that all the nights become adorned in Nishant. It is because of Indra that the seven rivers are able to cross with human benefit and ease. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
अति॑विद्धा विथु॒रेणा॑ चि॒दस्त्रा॒ त्रिः स॒प्त सानु॒ संहि॑ता गिरी॒णाम् । न तद्दे॒वो न मर्त्य॑स्तुतुर्या॒द्यानि॒ प्रवृ॑द्धो वृष॒भश्च॒कार॑ ॥ (२)
इंद्र ने बिना किसी की सहायता से अपने वज्र द्वारा इक्कीस पर्वतशुंगों को तोड़ा था. अभिलाषापूरक इंद्र ने जो काम किए हैं, उन्हें न देव कर सकते हैं और न मानव. (२)
Indra had broken twenty-one mountain peaks by his thunderbolt without anyone's help. Neither God nor human beings can do the work that Indra has done. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
इन्द्र॑स्य॒ वज्र॑ आय॒सो निमि॑श्ल॒ इन्द्र॑स्य बा॒ह्वोर्भूयि॑ष्ठ॒मोजः॑ । शी॒र्षन्निन्द्र॑स्य॒ क्रत॑वो निरे॒क आ॒सन्नेष॑न्त॒ श्रुत्या॑ उपा॒के ॥ (३)
इंद्र का वज्र उनके हाथ में दृढ़तापूर्वक पकड़ा गया है और उनकी भुजाओं में अधिक शक्ति है. युद्ध के लिए चलते समय इंद्र के सिर पर टोप आदि होते हैं एवं उनका आदेश सुनने के लिए लोग समीप पहुंचते हैं. (३)
Indra's thunderbolt is firmly held in his hand and there is more power in his arms. While walking for war, Indra has caps etc. on his head and people come close to listen to his order. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
मन्ये॑ त्वा य॒ज्ञियं॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मन्ये॑ त्वा॒ च्यव॑न॒मच्यु॑तानाम् । मन्ये॑ त्वा॒ सत्व॑नामिन्द्र के॒तुं मन्ये॑ त्वा वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम् ॥ (४)
हे इंद्र! मैं तुम्हें यज्ञ योग्य व्यक्तियों में सबसे श्रेष्ठ समझता हूं. मैं तुम्हें दृढ़ पर्वतों को तोड़ने वाला मानता हूं. मैं तुम्हें सेनाओं का ध्वज मानता हूं. मैं तुम्हें प्रजाओं की अभिलाषाएं पूरी करने वाला मानता हूं. (४)
O Indra! I consider you to be the best of the sacrificial persons. I consider you to be the one who breaks the fortified mountains. I consider you to be the flag of armies. I consider you to be the one who fulfills the wishes of the people. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
आ यद्वज्रं॑ बा॒ह्वोरि॑न्द्र॒ धत्से॑ मद॒च्युत॒मह॑ये॒ हन्त॒वा उ॑ । प्र पर्व॑ता॒ अन॑वन्त॒ प्र गावः॒ प्र ब्र॒ह्माणो॑ अभि॒नक्ष॑न्त॒ इन्द्र॑म् ॥ (५)
हे इंद्र! जिस समय तुम अपनी भुजाओं में श्रु का गर्व नष्ट करने वाला तथा मेघ को मारने वाला वज्र धारण करते हो एवं जिस समय मेघ एवं उन में भरा हुआ जल गर्जन करता है, उस समय स्तोता इंद्र के समीप जाते हुए उनकी स्तुति करते हैं. (५)
O Indra! At the time when you wear a thunderbolt in your arms that destroys the pride of The Shru and kills the cloud, and at the time when the cloud and the water that is filled with them roars, the stotas go near Indra and praise him. (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
तमु॑ ष्टवाम॒ य इ॒मा ज॒जान॒ विश्वा॑ जा॒तान्यव॑राण्यस्मात् । इन्द्रे॑ण मि॒त्रं दि॑धिषेम गी॒र्भिरुपो॒ नमो॑भिर्वृष॒भं वि॑शेम ॥ (६)
हम उस इंद्र की स्तुति करते हैं, जिसने इन सब जीवों को उत्पन्न किया है एवं सभी वस्तुएं जिनके बाद पैदा हुई हैं. हम उन्हीं इंद्र के साथ मित्रता करेंगे एवं स्तुतियों तथा नमस्कारों द्वारा अभिलाषापूरक इंद्र के सामने आएंगे. (६)
We praise the Indra who created all these creatures and all the things after which they are born. We will befriend the same Indra and will come before the desire-filled Indra through praises and greetings. (6)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
वृ॒त्रस्य॑ त्वा श्व॒सथा॒दीष॑माणा॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑जहु॒र्ये सखा॑यः । म॒रुद्भि॑रिन्द्र स॒ख्यं ते॑ अ॒स्त्वथे॒मा विश्वाः॒ पृत॑ना जयासि ॥ (७)
हे इंद्र! जो विश्वेदेव तुम्हारे मित्र थे, उन्होंने वृत्र असुर की सांस से भयभीत होकर तुम्हें छोड़ दिया था. उस समय मरुतों के साथ तुम्हारी मित्रता स्थापित हुई उसके बाद तुमने सभी शत्रुसेनाओं को जीत लिया. (७)
O Indra! Viswedev, who was your friend, had left you fearful of the breath of the Vrithra Asura. At that time your friendship with the Maruts was established, after that you conquered all the enemy armies. (7)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
त्रिः ष॒ष्टिस्त्वा॑ म॒रुतो॑ वावृधा॒ना उ॒स्रा इ॑व रा॒शयो॑ य॒ज्ञिया॑सः । उप॒ त्वेमः॑ कृ॒धि नो॑ भाग॒धेयं॒ शुष्मं॑ त ए॒ना ह॒विषा॑ विधेम ॥ (८)
हे इंद्र! तिरसठ यज्ञयोग्य मरुतों ने गायों के समान झुंड बनाकर तुम्हें बढ़ाया था. हम तुम्हारे समीप आते हैं. तुम हमें उपभोग के योग्य अन्न दो. हम अपने हव्य द्वारा तुम्हारा बल बढ़ावेंगे. (८)
O Indra! Sixty-three sacrificial maruts had raised you up by forming a herd like a cow. We come close to you. You give us food worthy of consumption. We will increase your strength by our word. (8)
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