हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.85.4

मंडल 8 → सूक्त 85 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 85
मन्ये॑ त्वा य॒ज्ञियं॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मन्ये॑ त्वा॒ च्यव॑न॒मच्यु॑तानाम् । मन्ये॑ त्वा॒ सत्व॑नामिन्द्र के॒तुं मन्ये॑ त्वा वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम् ॥ (४)
हे इंद्र! मैं तुम्हें यज्ञ योग्य व्यक्तियों में सबसे श्रेष्ठ समझता हूं. मैं तुम्हें दृढ़ पर्वतों को तोड़ने वाला मानता हूं. मैं तुम्हें सेनाओं का ध्वज मानता हूं. मैं तुम्हें प्रजाओं की अभिलाषाएं पूरी करने वाला मानता हूं. (४)
O Indra! I consider you to be the best of the sacrificial persons. I consider you to be the one who breaks the fortified mountains. I consider you to be the flag of armies. I consider you to be the one who fulfills the wishes of the people. (4)