हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 8.88.3

मंडल 8 → सूक्त 88 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 88
श्राय॑न्त इव॒ सूर्यं॒ विश्वेदिन्द्र॑स्य भक्षत । वसू॑नि जा॒ते जन॑मान॒ ओज॑सा॒ प्रति॑ भा॒गं न दी॑धिम ॥ (३)
हे सेवको! सूर्य की किरणें जिस प्रकार सूर्य से मिली रहती हैं, उसी प्रकार तुम सूर्य के सभी धनों का भोग करो. इंद्र ने शक्ति द्वारा धन उत्पन्न किए हैं. भविष्य में भी वह धन उत्पन्न करेंगे. हम उनका धन पैतृक भाग के समान लेंगे. (३)
O servants! Just as the sun's rays meet the sun, so you enjoy all the riches of the sun. Indra has generated wealth by power. In the future also he will generate wealth. We will take their wealth equally to the ancestral part. (3)