हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
ऋध॑गि॒त्था स मर्त्यः॑ शश॒मे दे॒वता॑तये । यो नू॒नं मि॒त्रावरु॑णाव॒भिष्ट॑य आच॒क्रे ह॒व्यदा॑तये ॥ (१)
जो मनुष्य यजमान की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए मित्र व वरुण को अपने सामने करता है, वह इस प्रकार यज्ञ के लिए हवि तैयार करता है, यह सत्य है. (१)
The man who does the friend and Varuna in front of him to fulfill the desire of the host, thus prepares the havi for the yajna, it is true. (1)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
वर्षि॑ष्ठक्षत्रा उरु॒चक्ष॑सा॒ नरा॒ राजा॑ना दीर्घ॒श्रुत्त॑मा । ता बा॒हुता॒ न दं॒सना॑ रथर्यतः सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑ ॥ (२)
अत्यंत बढ़े हुए बल वाले, देखने में विशाल, यज्ञकर्म के नेता, दीप्तिशाली व अतिशय विद्वान्‌ वे मित्र व वरुण दोनों भुजाओं के समान सूर्य की किरणों के साथ कर्म करते हैं. (२)
With a very increased force, vast in appearance, the leader of the yagnakarma, the bright and the most learned, they work with the rays of the sun like both the arms of the friend and Varuna. (2)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
प्र यो वां॑ मित्रावरुणाजि॒रो दू॒तो अद्र॑वत् । अयः॑शीर्षा॒ मदे॑रघुः ॥ (३)
हे मित्र व वरुण! जो गतिशील यजमान तुम्हारे सामने जाता है, वह देवों का दूत होता है, उसका सिर सोने से सुशोभित होता है एवं नशीला सोम प्राप्त करता है. (३)
Oh my friend and Varun! The dynamic host who goes before you is the messenger of the gods, his head is adorned with gold and receives intoxicating som. (3)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
न यः स॒म्पृच्छे॒ न पुन॒र्हवी॑तवे॒ न सं॑वा॒दाय॒ रम॑ते । तस्मा॑न्नो अ॒द्य समृ॑तेरुरुष्यतं बा॒हुभ्यां॑ न उरुष्यतम् ॥ (४)
हे मित्र व वरुण! जो शत्रु भली प्रकार पूछने पर भी प्रसन्न नहीं होता और जो बार-बार बुलाने एवं बातचीत करने पर भी आनंदित नहीं होता, आज हमें उसके साथ युद्ध से बचाओ. हमें उसकी भुजाओं से बचाओ. (४)
Oh my friend and Varun! The enemy who is not happy even when asked well and who does not rejoice in repeated calls and conversations, save us from war with him today. Save us from his arms. (4)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
प्र मि॒त्राय॒ प्रार्य॒म्णे स॑च॒थ्य॑मृतावसो । व॒रू॒थ्यं१॒॑ वरु॑णे॒ छन्द्यं॒ वचः॑ स्तो॒त्रं राज॑सु गायत ॥ (५)
हे यज्ञरूपी धन वाले उदगाताओ! तुम मित्र एवं अर्यमा के लिए सेवा करने योग्य एवं यज्ञशाला में उत्पन्न स्तुतियां सुनाओ. तुम वरुण के लिए प्रसन्नता देने वाले गीत गाओ एवं दीप्तिशाली मित्र, अर्यमा और वरुण की प्रशंसा करो. (५)
O you who have the wealth of yajna, you! You may recite the praises of the friend and the worthy of service to the Aryama and the hymns produced in the yajnashala. Sing happy songs for Varun and praise the brightest friends, Aryama and Varun. (5)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
ते हि॑न्विरे अरु॒णं जेन्यं॒ वस्वेकं॑ पु॒त्रं ति॑सॄ॒णाम् । ते धामा॑न्य॒मृता॒ मर्त्या॑ना॒मद॑ब्धा अ॒भि च॑क्षते ॥ (६)
वे देव पृथ्वी, अंतरिक्ष तथा द्युलोक तीनों को लाल रंग वाला, जय का साधन व निवासस्थान देने वाला एक सूर्यरूपी पुत्र देते हैं. वे मरणरहित एवं अपराजेय देवगण मनुष्यों के स्थानों को देखते हैं. (६)
They give the god earth, space and dulok to all three of them a red color, a source of victory and a sun-like son who gives them a place of abode. They see the places of the mortal and invincible gods. (6)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
आ मे॒ वचां॒स्युद्य॑ता द्यु॒मत्त॑मानि॒ कर्त्वा॑ । उ॒भा या॑तं नासत्या स॒जोष॑सा॒ प्रति॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑ ॥ (७)
हे सत्ययुक्त अश्चिनीकुमारो! तुम दोनों एक साथ मेरे द्वारा कहे गए एवं परम दीप्तिशाली वचन सुनने के लिए, यज्ञकर्म देखने के लिए एवं हव्य खाने के लिए आओ. (७)
O true Ashchinikumaro! You both come together to hear the most glorious words I have spoken and the most glorious words, to see the yajnakarmas, and to eat the havya. (7)

ऋग्वेद (मंडल 8)

ऋग्वेद: | सूक्त: 90
रा॒तिं यद्वा॑मर॒क्षसं॒ हवा॑महे यु॒वाभ्यां॑ वाजिनीवसू । प्राचीं॒ होत्रां॑ प्रति॒रन्ता॑वितं नरा गृणा॒ना ज॒मद॑ग्निना ॥ (८)
हे अन्न एवं धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारा राक्षसों को न मिलने वाला दान जिस समय हम मांगेंगे, उस समय तुम जमदग्नि की पूर्व की ओर मुंह वाली स्तुति सुनकर उसे बढ़ाते हुए यज्ञ के नेता के रूप में आओ. (८)
O Lord of food and wealth, Ashwinikumaro! At the time we ask for your unsavoury gift to the demons, at that time you hear the east-facing praise of Jamadagni and come as the leader of the yajna. (8)
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