ऋग्वेद (मंडल 9)
त्वं सो॑म विप॒श्चितं॑ पुना॒नो वाच॑मिष्यसि । इन्दो॑ स॒हस्र॑भर्णसम् ॥ (२५)
हे दीप्तिशाली एवं पवित्र होते हुए सोम! तुम हमें ऐसा वचन दो, जो हजारों का भरण करने वाला एवं बुद्धि द्वारा पवित्र हो. (२५)
O You, being glorious and holy, Mon! Give us a promise that is worth thousands and holy by wisdom. (25)