हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.73.7

मंडल 9 → सूक्त 73 → श्लोक 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 73
स॒हस्र॑धारे॒ वित॑ते प॒वित्र॒ आ वाचं॑ पुनन्ति क॒वयो॑ मनी॒षिणः॑ । रु॒द्रास॑ एषामिषि॒रासो॑ अ॒द्रुहः॒ स्पशः॒ स्वञ्चः॑ सु॒दृशो॑ नृ॒चक्ष॑सः ॥ (७)
यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं बुद्धिमान्‌ ऋत्विज्‌ अनेक धाराओं वाले, विस्तृत एवं शुद्ध सोम में स्थित माध्यमिका वाणी की स्तुति करते हैं. गतिशील, स्तोताओं से द्रोह न करने वाले, शोभन गति वाले, नेता एवं देखने में सुंदर मरुद्गण माध्यमिका वाणी की स्तुति करने वालों के वश में हो जाते हैं. (७)
The yajna-completer and the wise ritvaij praises the secondary voice located in the wide and pure soma, with many streams. The dynamic, the scoundrels of the hymns, the courtesan speed, the leaders and the beautiful deserts in view fall into the hands of those who praise the madhyamika voice. (7)