हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 9.97.30

मंडल 9 → सूक्त 97 → श्लोक 30 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 9)

ऋग्वेद: | सूक्त: 97
दि॒वो न सर्गा॑ अससृग्र॒मह्नां॒ राजा॒ न मि॒त्रं प्र मि॑नाति॒ धीरः॑ । पि॒तुर्न पु॒त्रः क्रतु॑भिर्यता॒न आ प॑वस्व वि॒शे अ॒स्या अजी॑तिम् ॥ (३०)
जिस प्रकार सूर्य की दिननिर्मात्री किरणें बनाई जाती हैं, उसी प्रकार राजा, मित्र एवं वीर सोम की लहरों का निर्माण होता है. जिस प्रकार यज्ञकर्मो के द्वारा प्रयत्न करने वाला पुत्र पिता को पराजित नहीं करता, उसी प्रकार तुम इस प्रजा को कभी पराजित मत करो. (३०)
Just as the day-making rays of the sun are created, so are the waves of raja, mitra and veer soma are formed. Just as the Son who strives through yajnakarma does not defeat the Father, so you should never defeat this people. (30)