सामवेद (अध्याय 15)
कविमिव प्रशँस्यं यं देवास इति द्विता । नि मर्त्येष्वादधुः ॥ (२)
देवताओं ने कवि की भांति दो रूपों (गार्हपत्य और आहवनीय) में मनुष्यों में अग्नि को प्रतिष्ठित किया. (२)
The gods, like poets, distinguished agni among human beings in two forms (garhapatya and ahvanya). (2)