हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
उत्त्वा मन्दन्तु सोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः । अव ब्रह्मद्विषो जहि ॥ (१)
हे इंद्र! सोमरस आप को आनंद दे. हे वज्रधारी इंद्र! आप हम पर धन बरसाइए. आप ब्राह्मणों के द्वेषियों का नाश कीजिए. (१)
O Indra! May Somers give you pleasure. O Vajradhari Indra! You shower money on us. You destroy the hatreds of Brahmins. (1)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
गिर्वणः पाहि नः सुतं मधोर्धाराभिरज्यसे । इन्द्र त्वादातमिद्यशः ॥ (२)
हे इंद्र! आप स्तुति करने योग्य हैं. आप हमारे छाने हुए इस सोमरस को पीजिए. आप को सोम की धारा से सींचा जाता है. हमें आप की कृपा से शुद्ध किया हुआ अन्न (धन) प्राप्त होता है. (२)
O Indra! You are praiseworthy. You drink this somersa of our shade. You are watered by the stream of Som. We get purified food (wealth) by your grace. (2)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
सदा व इन्द्रश्चर्कृषदा उपो नु स सपर्यन् । न देवो वृतः शूर इन्द्रः ॥ (३)
हे यजमानो! इंद्र हमेशा आप के पास हैं. वे पूजा किए जाने पर आप के यज्ञ की ओर आते हैं. हम ने महान इंद्र का वरण किया है. (३)
O hosts! Indra is always with you. They come towards your yajna when worshiped. We have chosen the great Indra. (3)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः । न त्वामिन्द्राति रिच्यते ॥ (४)
हे इंद्र! जैसे नदियां समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सोमरस आप में मिलता है. आप से बढ़ कर कोई महान नहीं है. (४)
O Indra! Just as rivers meet in the sea, so someras is found in you. There is no greater than you. (4)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः । इन्द्रं वाणीरनूषत ॥ (५)
सामगान गाते हुए उद्गाता (साम गाने वाले पुरोहित) बृहत्साम गा कर इंद्र को प्रसन्न करते हैं. पूजा करने वाले मनुष्य स्तोत्रों से और हम यजमान मंत्रों के द्वारा उन्हें प्रसन्न करते हैं. (५)
While singing samgan, udgata (priest who sings saam) pleases Indra by singing brihatsam. The worshiping human beings please them with the stotras and we the hosts please them through mantras. (5)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
इन्द्र इषे ददातु न ऋभुक्षणमृभुँ रयिम् । वाजी ददातु वाजिनम् ॥ (६)
हम जिस इंद्र की स्तुति कर रहे हैं, वे हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करें. इंद्र हमें उन ऋभु देवता को प्रदान करें, जो सोमरस पीने से अमर हो गए. बलवान इंद्र! हमें बलवान छोटे भाई दें ताकि हम अन्न प्राप्त कर सकें. (६)
May the Indra we are praising give us the best wealth. May Indra give us the Riphu devta, who became immortal by drinking Someras. Strong Indra! Give us strong younger brothers so that we can get food. (6)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत् । स हि स्थिरो विचर्षणिः ॥ (७)
हे इंद्र! आप स्थिर हैं. आप सारे संसार को देखने वाले व ज्ञानी हैं. आप शीघ्र ही भय को दूर करने वाले तो हैं ही, साथ ही भय को हमेशा के लिए हटा देते हैं. (७)
O Indra! You are stable. You are the one who sees and knows the whole world. You are soon going to remove fear, as well as remove fear forever. (7)

सामवेद (अध्याय 2)

सामवेद: | खंड: 9
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः । गावो वत्सं न धेनवः ॥ (८)
हे इंद्र! आप त्रहचा (मंत्रों) से स्तुति करने योग्य हैं. प्रत्येक यज्ञ में हमारी प्रार्थनाएं आप के पास वैसे ही जल्दी पहुंचती हैं, जैसे दुधारू गाएं अपने बछड़ों के पास पहुंचती हैं. (८)
O Indra! You are praiseworthy of trichacha (mantras). In every yajna, our prayers reach you as quickly as milch cows reach their calves. (8)
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