हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 21.2.8

अध्याय 21 → खंड 2 → मंत्र 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 21)

सामवेद: | खंड: 2
अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः स्रुचश्चरन्त्यध्वरे । ऊर्जो नपातं घृतकेशमीमहेऽग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम् ॥ (८)
हे अग्नि! आप सर्वत्र भ्रमणशील और बलवर्द्धक हैं. आप के यजमान पुत्र आप के पास हवि पहुंचाने के लिए आतुर हैं. आप उन की आहुतियां अंगीकार कीजिए. आप ऊर्जा का नाश रोकते हैं. हम आप की यज्ञ में सर्वप्रथम आराधना करते हैं. आप घी से बढ़ते हैं. (८)
O agni! You are everywhere travelling and strong. Your host sons are eager to bring havi to you. You accept their sacrifices. You stop the destruction of energy. We worship you first in the yajna. You grow with ghee. (8)