सामवेद (अध्याय 22)
मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम् । परि यज्ञं नि षेदथुः ॥ (६)
हे देवियो! हे अंतरिक्षलोक! यजमान आप के सखा हैं. आप यजमान की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. आप यज्ञ को पूर्ण कराते हैं. आप यज्ञ को पूरा सहयोग देते हैं. (६)
O ladies! O spaceland! The host is your friend. You fulfill the wishes of the host. You complete the yajna. You give full support to the yajna. (6)