हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 22.4.11

अध्याय 22 → खंड 4 → मंत्र 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 22)

सामवेद: | खंड: 4
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति । अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीडन्नसरद्वृषा हरिः ॥ (११)
हे यजमानो! आप सोम के गुण गाइए. सोम ज्ञानी व हरे हैं. वे विशाल धाराएं धारण करते हैं. सांप के केंचुली बदलने की तरह वे अपनी पुरानी छाल बदल देते हैं. वे घोड़े जैसे खेलते हुए द्रोणकलश में जाते हैं. (११)
O hosts! You sing the virtues of Mon. Som is knowledgeable and green. They hold huge currents. Like a snake changing earthworm, they change their old bark. They go to Dronakalsh playing like a horse. (11)