सामवेद (अध्याय 24)
य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय सँस्कृतः । यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत् ॥ (१५)
हे इंद्र! हमारी संस्कृत में रची हुई स्तुतियों को सुन कर आप अवश्य ही कहीं और नहीं जाएंगे. आप हमारे ही यज्ञ में आने की कृपा करेंगे. वे रण (युद्ध) में स्थिर, अस्त्रशस्त्र से सञ्जित व उग्र रहते हैं. (१५)
O Indra! After listening to our praises made in Sanskrit, you will definitely not go anywhere else. You will be pleased to come to our own yajna. They remain stable, armed and furious in the battle. (15)