सामवेद (अध्याय 6)
भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि । स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्चो दृशेऽदाः ॥ (१)
हे अग्नि! आप चमचमाते हैं. आप का मुख प्रकाशित है. उस मुख में जीभ अग्नि की ज्वाला में डाली गई हवि खाती है. आप धन देने वाले हैं. आप अन्न व रमणीय धन दीजिए. (१)
O agni! You gleam. Your mouth is published. In that mouth, the tongue eats the havi inserted in the flame of agni. You are going to give money. You give food and delightful money. (1)
सामवेद (अध्याय 6)
वसन्त इन्नु रन्त्यो ग्रीष्म इन्नु रन्त्यः । वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्नु रन्त्यः ॥ (२)
वसंत ऋतु लुभावनी है. ग्रीष्म ऋतु लुभावनी है. वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ऋतुएं भी लुभावनी हैं. (२)
Spring is breathtaking. Summer is breathtaking. The rainy, autumn, hemant and shishir seasons are also breathtaking. (2)
सामवेद (अध्याय 6)
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिँ सर्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ (३)
पूर्ण पुरुष हजारों सिरों वाला है. वह हजारों आंखों वाला है, हजारों पैरों वाला है. वह सारे ब्रह्मांड को घेर सकने में समर्थ है. फिर भी वह बाकी रहता है. (३)
The full man is with thousands of heads. He is thousands of eyes, thousands of feet. He is capable of encircling the entire universe. Yet he remains. (3)
सामवेद (अध्याय 6)
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पदोऽस्येहाभवत्पुनः । तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि ॥ (४)
पूर्ण पुरुष तीन पैरों वाला है. वह ऊंचे स्थान पर वास करता है. इस पूर्ण पुरुष से ही सारा संसार पैदा होता है. चेतन और अचेतन सभी में इसी पूर्ण पुरुष का विस्तार है. यह विविध स्वरूपों वाला है. यह सर्वत्र व्याप्त है. (४)
The complete man is three legs. He lives in a high place. The whole world is born from this perfect man. The conscious and the unconscious are all the extensions of this perfect man. It has diverse formats. It is everywhere. (4)
सामवेद (अध्याय 6)
पुरुष एवेदँ सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (५)
भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों का कर्ता पूर्ण पुरुष ही है. इस के तीन पैर अमर स्वर्गलोक में हैं. इस के शेष चौथे चरण में सारे प्राणी हैं. (५)
The creator of the past, present and future is the complete man. Its three legs are in immortal paradise. The remaining fourth stage of this is all beings. (5)
सामवेद (अध्याय 6)
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (६)
पूर्ण पुरुष जड़चेतन और समस्त पृथ्वी से भी विस्तृत (बड़ा) है. वह अमरता का स्वामी है. अन्न से बढ़ने वाले प्राणियों का भी स्वामी है. (६)
The whole man is the root conscious and wider than the whole earth. He is the master of immortality. He is also the master of animals growing from food. (6)
सामवेद (अध्याय 6)
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (७)
उस पुरुष से विराट् (ब्रह्मांड) पुरुष उत्पन्न हुआ. उस से अन्य पुरुष उत्पन्न हुए. उस के बाद उस ने पशुपक्षियों और अन्य जीवों को उत्पन्न किया. (७)
From that man, the universe man was born. Other men were born from it. After that he produced animals and other creatures. (7)
सामवेद (अध्याय 6)
मन्ये वाँ द्यावापृथिवी सुभोजसौ ये अप्रथेथाममितमभि योजनम् । द्यावापृथिवी भवतँ स्योने ते नो मुञ्चतमँहसः ॥ (८)
हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक! आप हमारे पालनहार हैं. हम आप को इसी रूप में जानते हैं. आप हमारा अपार वैभव बढ़ाइए. हे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के देवता! आप हमें सुख दीजिए. आप हमें पापों से दूर कीजिए. (८)
O paradise and earth! You are our sustainer. That's how we know you. You increase our immense glory. O God of heaven and earth! You give us happiness. You remove us from sins. (8)