यजुर्वेद (अध्याय 1)
शर्मा॒स्यव॑धूत॒ꣳ रक्षोऽव॑धूता॒ऽअरा॑त॒योऽदि॑त्या॒स्त्वग॑सि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वेत्तु। अद्रि॑रसि वानस्प॒त्यो ग्रावा॑सि पृ॒थुबु॑ध्नः॒ प्रति॒ त्वादि॑त्या॒स्त्वग्वे॑त्तु ॥ (१४)
सुख के आसन से राक्षसों, दुष्टों व दैत्यों को दूर कर दिया गया है. आसन पृथ्वी पर आवरण है. पृथ्वी माता उस आसन को स्वीकार करने की कृपा करें. आप पत्थर की तरह मजबूत हैं. आप का आधार भी पत्थर की तरह मजबूत है. आप वनस्पति से निर्मित हैं. पृथ्वी माता आप को धारण करने की कृपा करें. (१४)
Demons, evil and demons have been removed from the seat of happiness. The seat is the covering on the earth. May Mother Earth please accept that asana. You are as strong as a stone. Your base is also as strong as a stone. You are made from vegetation. May Mother Earth bless you with the blessings. (14)