हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 12.109

अध्याय 12 → मंत्र 109 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
इ॒र॒ज्यन्न॑ग्ने प्रथयस्व ज॒न्तुभि॑र॒स्मे रायो॑ऽअमर्त्य। स द॑र्श॒तस्य॒ वपु॑षो॒ वि रा॑जसि पृ॒णक्षि॑ सान॒सिं क्रतु॑म् ॥ (१०९)
हे अग्नि! आप अविनाशी हैं. यजमान सर्वप्रथम आप को प्रज्चलित करते हैं. आप यजमानों को धन प्रदान कीजिए. आप अपने सुंदर शरीर से शोभित होते हैं. आप यज्ञ में सारी आकांक्षाएं पूर्ण करते हैं. (१०९)
O agni! You are indestructible. The host first ignites you. You give money to the hosts. You are adorned with your beautiful body. You fulfill all the aspirations in the yajna. (109)