यजुर्वेद (अध्याय 12)
इ॒ष्क॒र्त्तार॑मध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसं॒ क्षय॑न्त॒ꣳ राध॑सो म॒हः। रा॒तिं वा॒मस्य॑ सु॒भगां॑ म॒हीमिषं॒ दधा॑सि सान॒सिꣳ र॒यिम् ॥ (११०)
हे अग्नि! आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, श्रेष्ठ चिंतन वाले हैं. आप यजमान को महान् धन प्रदान करते हैं. उस को सौभाग्यशाली और महान् महिमावान बनाते हैं. आप हमारे लिए भौतिक और आध्यात्मिक वैभव धारण करते हैं. (११०)
O agni! You are the creator of yajna, the best thinker. You give great wealth to the host. Make him lucky and greatly glorious. You possess material and spiritual splendor for us. (110)