हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 12.54

अध्याय 12 → मंत्र 54 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
लो॒कं पृ॑ण छि॒द्रं पृ॒णाथो॑ सीद ध्रु॒वा त्वम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी त्वा॒ बृह॒स्पति॑र॒स्मिन् योना॑वसीषदन् ॥ (५४)
हे अग्नि! लोक को पूरने से जो जगह रह गई आप उन छेदों को भरने की कृपा कीजिए. आप वहां स्थिर हो कर स्थापित होने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव अग्नि और बृहस्पति देव ने यहां स्थापित किया है. (५४)
O agni! Please fill the holes that have left the people in the whole place. Please be there and established. You have been established here by Indra Dev Agni and Brihaspati Dev. (54)