यजुर्वेद (अध्याय 17)
स॒म्यक् स्र॑वन्ति स॒रितो॒ न धेना॑ऽअ॒न्तर्हृ॒दा मन॑सा पू॒यमा॑नाः। ए॒तेऽअ॑र्षन्त्यू॒र्मयो॑ घृ॒तस्य॑ मृ॒गाऽइ॑व क्षिप॒णोरीष॑माणाः ॥ (९४)
जैसे सम्यक् रूप से नदी बहती है, वैसे ही हमारे अंत:हृदय से पवित्र की जाती हुई वाणी स्रवित होती है. ये वाणियां घी की तरंगों की तरह हैं. यज्ञ की ओर शिकारी से डरे हुए हिरण की तरह भागती हैं. (९४)
Just as the river flows properly, so does the voice sanctified from our heart. These vaanis are like waves of ghee. They run towards the yajna like a scared deer from the hunter. (94)