हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 31.15

अध्याय 31 → मंत्र 15 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
स॒प्तास्या॑सन् परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिधः॑ कृ॒ताः।दे॒वा यद्य॒ज्ञं॑ त॑न्वा॒नाऽअब॑ध्न॒न् पुरु॑षं प॒शुम् ॥ (१५)
देवताओं ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उस यज्ञ में परम पुरुष को ही हवि के पशु के रूप में बांधा, उस यज्ञ में सात परिधियां और इक्कीस समिधाएं हुई. (१५)
In the yajna that the gods expanded, in that yajna, the Supreme Man was tied as the animal of Havi, in that yajna, there were seven paridhis and twenty-one samidhas. (15)