यजुर्वेद (अध्याय 4)
आकू॑त्यै प्र॒युजे॒ऽग्नये॒ स्वाहा॑ मे॒धायै॒ मन॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहा॑ दी॒क्षायै॒ तप॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै पू॒ष्णेऽग्नये॒ स्वाहा॑। आपो॑ देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो॒ द्यावा॑पृथिवी॒ऽउरो॑ऽन्तरिक्ष। बृह॒स्पत॑ये ह॒विषा॑ विधेम॒ स्वाहा॑ ॥ (७)
अग्नि यज्ञ के संकल्प की प्रेरणा देने वाले हैं. उन के लिए स्वाहा. अग्नि यज्ञ की बुद्धि देते हैं. यज्ञ करने में मन को प्रेरित करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. दीक्षा और तप की सिद्धि हेतु अग्नि को यह आहुति दी जाती है. सरस्वती देवी के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. हे जल देव! आप के लिए स्वाहा. संसार के पालक शंभु देव के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा. पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. विशाल अंतरिक्षलोक के लिए स्वाहा. हम बृहस्पति के लिए हवि समर्पित करते हैं. उन के लिए स्वाहा. (७)
He is the inspiration for the resolution of agni yajna. Swaha for them. They give the wisdom of agni sacrifice. Motivates the mind to perform yajna. Swaha for agni. This sacrifice is given to agni for the accomplishment of initiation and penance. Swaha for Saraswati Devi. Swaha for Pusha Dev. Swaha for agni. O God of Water! Swaha for you. Swaha for Shambhu Dev, the guardian of the world. Swaha for heaven. Swaha for the earth. Swaha for the vast spaceland. We dedicate Havi to Jupiter. Swaha for them. (7)