यजुर्वेद (अध्याय 5)
उद्दिव॑ꣳ स्तभा॒नान्तरि॑क्षं पृण॒ दृꣳह॑स्व पृथि॒व्यां द्यु॑ता॒नस्त्वा॑ मारु॒तो मि॑नोतु मि॒त्रावरु॑णौ ध्रु॒वेण॒ धर्म॑णा। ब्र॒ह्म॒वनि॑ क्षत्र॒वनि॑ रायस्पोष॒वनि॒ पर्यू॑हामि। ब्रह्म॑ दृꣳह क्ष॒त्रं दृ॒ꣳहायु॑र्दृꣳह प्र॒जां दृ॑ꣳह ॥ (२७)
हे उदुंबर शाखे (गूलर की लकड़ी)! स्वर्गलोक को ऊंचा उठाने, अंतरिक्षलोक को पूर्ण करने व पृथ्वीलोक को दूढ़ करने की कृपा कीजिए. मरुद्गण स्वर्गलोक का विस्तार करते हैं. (२७)
O Udumbar Shakhe (sycamore wood)! Please elevate heaven, complete space and weaken earth. The deserts expand the paradise. (27)