यजुर्वेद (अध्याय 5)
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑दे॒ नार्य॑सी॒दम॒हꣳ रक्ष॑सां ग्री॒वाऽअपि॑कृन्तामि॒। यवो॑ऽसि य॒वया॒स्मद् द्वेषो॑ य॒वयारा॑तीर्दि॒वे त्वा॒ऽन्तरि॑क्षाय त्वा पृथि॒व्यै त्वा॒ शुन्ध॑न्ताँल्लो॒काः पि॑तृ॒षद॑नाः पितृ॒षद॑नमसि ॥ (२६)
सविता देव सभी देवताओं को उत्पन्न करने बाले हैं. उन को अश्विनी देवताओं की बाहु से धारण करते हैं. उन को पूषा देवता के हाथों से धारण करते हैं. वे हमारे मन के अनुकूल होने की कृपा करें. हम राक्षसों की गरदन काट कर अलग करते हैं. उन का नाश करते हैं. आप यव हैं. हमें शत्रुं से अलग करने की कृपा कीजिए. हम स्वर्गलोक, अंतरिक्ष व पृथ्वी हेतु आप का प्रेक्षण करते हैं. हम पृथ्वी के लिए स्थान को शुद्ध करते हैं. यह पितरों का सदन है. यह पितरों का निवास स्थान है. (२६)
Savita Dev is the creator of all gods. Ashwini wears them with the arms of the gods. They are worn by the hands of the pusha deity. May they please adapt to our minds. We cut off the necks of demons and separate them. Destroy them. You are Yav. Please separate us from our enemies. We observe you for heaven, space and earth. We purify the space for the earth. This is the house of fathers. It is the abode of ancestors. (26)