हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 1.11.5

कांड 1 → सूक्त 11 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
वि ते॑ भिनद्मि॒ मेह॑नं॒ वि योनिं॒ वि ग॒वीनि॑के । वि मा॒तरं॑ च पु॒त्रं च॒ वि कु॑मा॒रं ज॒रायु॒णाव॑ ज॒रायु॑ पद्यताम् ॥ (५)
हे गर्भिणी! मैं गर्भस्थ बालक को बाहर निकालने के लिए मूत्रमार्ग को फैलाता हूं तथा योनि के आसपास की नाड़ियों को भी फैलाता हूं. क्योंकि ये प्रसव में बाधा डालती हैं. मैं माता और पुत्र को अलगअलग करता हूं. इस के बाद मैं पुत्र को जरायु से अलग करता हूं. जरायु गर्भाशय से नीचे गिर जाए. (५)
This pregnant woman! I stretch the urethra to get the baby out and also the nerves around the vagina. Because they hinder delivery. I separate mother and son. After this, I separate the son from the young man. The newborn falls down from the uterus. (5)