अथर्ववेद (कांड 10)
तयो॑र॒हं प॑रि॒नृत्य॑न्त्योरिव॒ न वि जा॑नामि यत॒रा प॒रस्ता॑त् । पुमा॑नेनद्वय॒त्युद्गृ॑णत्ति॒ पुमा॑नेन॒द्वि ज॑भा॒राधि॒ नाके॑ ॥ (४३)
उन नृत्य करती हुई दो स्त्रियों अर्थात् दिन और रात में कौन सी दूसरी है, यह मैं नहीं जानता. उस वस्त्र को एक पुरुष बुनता है तथा दूसरा उधेड़ता है. इसे वह स्वर्ग में धारण करता है. (४३)
I don't know which two dancing women, that is, which other day and night. The cloth is woven by one man and the other is pulled out. He holds it in heaven. (43)