हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.10.26

कांड 11 → सूक्त 10 → मंत्र 26 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
प्रा॑णापा॒नौ चक्षुः॒ श्रोत्र॒मक्षि॑तिश्च॒ क्षिति॑श्च॒ या । व्या॑नोदा॒नौ वाङ्मनः॒ शरी॑रेण॒ त ई॑यन्ते ॥ (२६)
प्राण और अपान वायुएं, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन-ये सभी इस शरीर में प्रवेश कर के अपने-अपने काम लगे हैं. (२६)
Prana and apana air, eyes, ears, lack of destruction and destruction, vayan and udan airs, speech and mind - all these have entered this body and started their own work. (26)