अथर्ववेद (कांड 11)
उत्क॑सन्तु॒ हृद॑यान्यू॒र्ध्वः प्रा॒ण उदी॑षतु । शौ॑ष्का॒स्यमनु॑ वर्तताम॒मित्रा॒न्मोत मि॒त्रिणः॑ ॥ (२१)
हमारे शत्रुओं के हृदय उन के शरीर से निकल जाएं. उन की प्राण वायु भी उन के शरीर से निकल जाए. मुख सूख जाने से हमारे शत्रु मर जाएं. हमारे मित्रों का मुख न सूखे. (२१)
Let the hearts of our enemies go out of their bodies. Their life and air should also come out of their body. Our enemies die due to dry mouth. Our friends' faces should not be dry. (21)