हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.11.22

कांड 11 → सूक्त 11 → मंत्र 22 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
ये च॒ धीरा॒ ये चाधी॑राः॒ परा॑ञ्चो बधि॒राश्च॒ ये । त॑म॒सा ये च॑ तूप॒रा अथो॑ बस्ताभिवा॒सिनः॑ । सर्वां॒स्ताँ अ॑र्बुदे॒ त्वम॒मित्रे॑भ्यो दृ॒शे कु॑रूदा॒रांश्च॒ प्र द॑र्शय ॥ (२२)
हे अर्बुदि नाम के सर्प! हमारे शत्रुओं में जो वीर कायर, युद्ध से भागने वाले, भय के कारण कुछ न सुनने वाले, बिना सींग के पशुओं के समान हानि न पहुंचाने वाले और भेड़ों के समान शब्द करने वाले हैं, उन सब को अपनी माया से पराजित होने वाला बनाओ. हे सर्प! तुम हमारे शन्रुओं को अपनी माया के द्वारा उल्कापात आदि अपशकुन दिखाओ. (२२)
O serpent named Arbudi! Make all of our enemies who are brave cowards, who run away from war, hear nothing out of fear, do not harm like animals without horns and say words like sheep, make them all defeated by your maya. O serpent! Show our shanrus a bad omens like meteorites through your maya. (22)