अथर्ववेद (कांड 11)
प्रा॒णो मृ॒त्युः प्रा॒णस्त॒क्मा प्रा॒णं दे॒वा उपा॑सते । प्रा॒णो ह॑ सत्यवा॒दिन॑मुत्त॒मे लो॒क आ द॑धत् ॥ (११)
ये प्राण देव ही मृत्यु करने वाले हैं एवं यही जीवन को कष्टमय बनाने वाले ज्वर हैं. शरीर के मध्य में वर्तमान इन्हीं प्राण की देवगण उपासना करते हैं. (११)
This prana dev is the one who kills death and this is the fever that makes life painful. In the middle of the body, the gods worship these present pranas. (11)