हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.6.12

कांड 11 → सूक्त 6 → मंत्र 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
प्रा॒णो वि॒राट्प्रा॒णो देष्ट्री॑ प्रा॒णं सर्व॒ उपा॑सते । प्रा॒णो ह॒ सूर्य॑श्च॒न्द्रमाः॑ प्रा॒णमा॑हुः प्र॒जाप॑तिम् ॥ (१२)
प्राण अर्थात्‌ स्थूल प्रपंच का अभिमानी देवता ईश्वर प्राण है तथा अपनेअपने व्यापारों में सब को प्रेरित करने वाला परम देवता प्राण है. अपने मनचाहे फल को पाने के लिए सभी प्राण की उपासना करते हैं. प्राण सूर्य और चंद्रमा है तथा प्राण को ही ज्ञानी जन सब की रचना करने वाला प्रजापति कहते हैं. (१२)
Prana, the arrogant god of gross power, is Prana and the supreme god who inspires everyone in his business is Prana. Everyone worships prana to get the fruit they want. Prana is the sun and moon, and prana is called Prajapati, who creates all the wise people. (12)