हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.6.16

कांड 11 → सूक्त 6 → मंत्र 16 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
आ॑थर्व॒णीरा॑ङ्गिर॒सीर्दै॒वीर्म॑नुष्य॒जा उ॒त । ओष॑धयः॒ प्र जा॑यन्ते य॒दा त्वं प्रा॑ण॒ जिन्व॑सि ॥ (१६)
अथर्वा महर्षि द्वारा, अंगिरा महर्षि द्वारा, देवों द्वारा तथा मनुष्यों द्वारा उत्पन्न अनेक प्रकार की जड़ीबूटियों और फसलों को हे प्राण! तुम ही वर्षा का जल प्रदान कर के प्रसन्न करते हो. (१६)
O life to many types of herbs and crops produced by Atharva Maharishi, by Angira Maharishi, by devas and by human beings! You are the one who pleases by providing rainwater. (16)