अथर्ववेद (कांड 12)
त्वम॑स्या॒वप॑नी॒ जना॑ना॒मदि॑तिः काम॒दुघा॑ पप्रथा॒ना । यत्त॑ ऊ॒नं तत्त॒ आ पू॑रयाति प्र॒जाप॑तिः प्रथम॒जा ऋ॒तस्य॑ ॥ (६१)
हे पृथ्वी! तुम कामनाओं को पूर्ण करने वाली हो. तुम इस विश्व की क्षेत्र रूपी विस्तार वाली हो. तुम्हारे कम होने वाले भाग को प्रजापति पूरा करते हैं. (६१)
O earth! You are going to fulfill desires. You are the region-like expanse of this world. Prajapati completes your decreasing part. (61)